युवा कांग्रेस के चुनाव में बीजेपी युवा मोर्चा की कथित सक्रियता, दोनों दलों की सियासत पर उठे सवाल।

युवा कांग्रेस के चुनाव में बीजेपी युवा मोर्चा की कथित सक्रियता, दोनों दलों की सियासत पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ में युवा कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है। 18 से 35 वर्ष की आयु के मतदाताओं को चुनाव में भाग लेने का मौका दिया गया है, ऐसे में कांग्रेस के साथ-साथ दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े युवाओं की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि कुछ ऐसे कार्यकर्ता, जो खुद को बीजेपी युवा मोर्चा से जुड़ा बताते हैं, युवा कांग्रेस के चुनाव में वोटिंग से लेकर डोर-टू-डोर प्रचार तक में कथित तौर पर सक्रिय नजर आ रहे हैं। अगर यह बात सही है तो सवाल बीजेपी संगठन की अनुशासन व्यवस्था पर भी खड़ा होता है कि पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता विपक्षी दल के संगठनात्मक चुनाव में खुलकर सक्रिय रहें तो क्या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी या इसे नजरअंदाज किया जाएगा।वहीं दूसरी तरफ युवा कांग्रेस का चुनाव कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को भी सामने ला रहा है। प्रदेश से लेकर स्थानीय स्तर तक अलग-अलग खेमों में बंटे नेता और कार्यकर्ता अपने-अपने समर्थकों को संगठन में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं। बड़े नेताओं के समर्थक भी इस चुनाव में अपनी ताकत दिखाने में लगे हैं। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए यह पहचानना आसान नहीं होगा कि कौन कार्यकर्ता संगठन और पार्टी के लिए पूरी तरह समर्पित है और कौन केवल संगठन में पद और राजनीतिक भविष्य की तलाश में सक्रिय है।सबसे बड़ा सवाल बीजेपी पर भी है। अगर उसके युवा मोर्चा से जुड़े कार्यकर्ता वाकई विपक्षी पार्टी के चुनाव में वोटिंग और प्रचार कर रहे हैं तो क्या बीजेपी इसे पार्टी अनुशासन का उल्लंघन मानेगी? आम चुनाव के दौरान अनुशासनहीनता पर कार्रवाई की बात करने वाला संगठन अपने ही कार्यकर्ताओं की ऐसी कथित भूमिका पर क्या रुख अपनाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि विपक्षी दल के संगठनात्मक चुनाव में सक्रियता को महज व्यक्तिगत पसंद माना जाएगा या पार्टी के प्रति निष्ठा का सवाल उठेगा, इस पर अब निगाहें टिकी हैं।दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। संगठन के भीतर गुटबाजी, पद की होड़ और अलग-अलग खेमों की सक्रियता अगर चुनाव तक सीमित नहीं रहती और इसका असर विधानसभा चुनाव तक पहुंचता है, तो पार्टी के सामने अपने वास्तविक जमीनी कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की चुनौती होगी।यानी एक तरफ कांग्रेस अपने संगठनात्मक चुनाव में कई खेमों में बंटी नजर आ रही है, तो दूसरी तरफ बीजेपी के कुछ कार्यकर्ताओं की कथित रूप से विपक्षी चुनाव में सक्रियता ने पार्टी अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्ता और संगठन की राजनीति के बीच कार्यकर्ता आखिर किसके साथ है—पार्टी, पद या अपने राजनीतिक भविष्य के साथ? यह सवाल आने वाले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है।












