जांजगीर चांपा

कलियुग में भक्ति ही भगवान की प्राप्ति का सरलतम मार्ग: रासेश्वरी देवी जी।

उपनिषद ज्ञानामृत के तेरहवें दिन ज्ञानयोग और भक्तियोग का बताया अंतर, कहा—सच्ची भक्ति से ज्ञान और वैराग्य स्वतः उत्पन्न होते हैं।

कलियुग में भक्ति ही भगवान की प्राप्ति का सरलतम मार्ग: रासेश्वरी देवी जी

उपनिषद ज्ञानामृत के तेरहवें दिन ज्ञानयोग और भक्तियोग का बताया अंतर, कहा—सच्ची भक्ति से ज्ञान और वैराग्य स्वतः उत्पन्न होते हैं

जांजगीर। हाई स्कूल ग्राउंड जांजगीर में 25 सितंबर से 8 अक्टूबर तक आयोजित ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के तेरहवें दिन आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के गूढ़ रहस्यों पर सारगर्भित प्रवचन हुआ। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने ज्ञानयोग और भक्तियोग के सूक्ष्म अंतर को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि कोरे ज्ञान से नहीं, बल्कि भगवान के प्रति निष्काम प्रेम और भक्ति से ही मनुष्य अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि भगवान के सच्चिदानंद स्वरूप के आधार पर शास्त्रों में कर्म, ज्ञान और भक्ति—तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं। ज्ञान मार्ग की कठिन साधना को समझाते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञानी अपने पुरुषार्थ से तमोगुण और रजोगुण पर विजय प्राप्त कर निर्विकल्प समाधि तक पहुंच सकता है, लेकिन सत्वगुण से पार पाना उसके लिए भी सहज नहीं है। विद्या माया को पार करने के लिए अंततः भगवान की शरण और भक्ति आवश्यक हो जाती है।

उन्होंने बताया कि अद्वैत दर्शन के प्रवर्तक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी सगुण-साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण की भक्ति की। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान की चरम अवस्था के बाद भी भगवान की भक्ति और प्रेम का महत्व बना रहता है।

ज्ञान का ब्रह्मानंद और भक्ति का प्रेमानंद

ज्ञानी और भक्त के आनंद का अंतर समझाते हुए रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि ज्ञानी का ब्रह्मानंद गुड़ की चाय के समान है, जबकि भक्त का प्रेमानंद मिश्री की चाय के समान अधिक मधुर और विलक्षण है। उन्होंने कहा कि राजा जनक, शुकदेव परमहंस और उद्धव जैसे महान ज्ञानी भी अंततः ज्ञान के ब्रह्मानंद से आगे बढ़कर भक्ति के प्रेमानंद में डूबे।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान की सच्ची भक्ति करने वाले साधक को ज्ञान और वैराग्य के लिए अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भक्ति के साथ ज्ञान और वैराग्य स्वतः विकसित होने लगते हैं।

चंचल मनुष्य के लिए भक्ति सबसे सहज मार्ग

कलियुग के जीवों के लिए भक्ति मार्ग की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने कहा कि पूर्ण विरक्त व्यक्ति ज्ञान मार्ग का अधिकारी है और अत्यधिक आसक्त व्यक्ति कर्म मार्ग का। लेकिन सामान्य संसारी मनुष्य की स्थिति इन दोनों के बीच होती है। परिस्थितियों के अनुसार कभी आसक्ति बढ़ती है तो कभी विरक्ति का भाव उत्पन्न हो जाता है।

ऐसे चंचल और सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाले मनुष्यों के लिए भक्ति मार्ग को सबसे सरल, सहज और सर्वश्रेष्ठ मार्ग बताया गया है। उन्होंने कहा कि भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला है और हर व्यक्ति भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से इस मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

रासेश्वरी देवी जी ने बताया कि भक्ति क्या है, इसके कितने प्रकार हैं और भक्ति करने की सही विधि क्या है, इन महत्वपूर्ण विषयों पर अगले प्रवचन में विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा।

सुबह ध्यान साधना का भी हो रहा आयोजन

प्रवचन के साथ आध्यात्मिक साधना को व्यवहारिक जीवन से जोड़ने के उद्देश्य से पूजनीया रासेश्वरी देवी जी के मार्गदर्शन में 4 से 8 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 7:30 से 9 बजे तक ‘रूप ध्यान साधना’ (मेडिटेशन) सत्र का आयोजन हाई स्कूल ग्राउंड, जांजगीर में किया जा रहा है। श्रद्धालुओं से इस प्रातःकालीन ध्यान सत्र में शामिल होकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने की अपील की गई है।

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