ना मै गिरा न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे,गिरे तो वो 100 बार जो मुझे गिराने कलेंडर बदला सत्ता बदले नहीं बदले तो करेक्टर……. दशानन रावण हूं मै…..

ना मै गिरा न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे,गिरे तो वो 100 बार जो मुझे गिराने कलेंडर बदला सत्ता बदले नहीं बदले तो करेक्टर……. दशानन रावण हूं मै…..
आखिर क्यों बना रावण का मजाक? पांच मिनट में जल गया पूरा शरीर, लेकिन 10 सिर और दोनों हाथ मानो अमृत से सुरक्षित! जांजगीर-नैला नगरपालिका की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल…..
दशानन दहन में खलल, जनभावनाओं से खिलवाड़ या व्यवस्था की लापरवाही? ट्रिपल इंजन की सरकार में नगर पालिका की जवाबदेही पर सवाल
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा, लेकिन जांजगीर के हाईस्कूल मैदान में हुए दशानन दहन के बाद आयोजन की व्यवस्थाएं ही सवालों के घेरे में आ गईं। कल रावण दहन के दौरान ऐसा दृश्य देखने को मिला कि कुछ ही मिनटों में दशानन का पूरा शरीर जल गया, लेकिन उसके 10 सिर और एक हाथ मानो अमृत छिड़कने से सुरक्षित रह गए हों! करीब पांच मिनट में शरीर का अधिकांश हिस्सा जल जाने के बाद भी सिर और हाथ का इस तरह बचे रहना लोगों के बीच चर्चा और सवालों का विषय बन गया। आखिर रावण के पुतले का निर्माण और दहन की व्यवस्था किस तरह की गई थी? क्या आयोजन की तैयारी में तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिया गया था, या फिर जिम्मेदारों ने इसे महज एक औपचारिकता समझ लिया?
#आखिर क्यों बनाया गया रावण का मजाक?
दशहरा केवल एक पुतला जलाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, परंपरा और जनभावनाओं से जुड़ा पर्व है। ऐसे में हाईस्कूल मैदान में आयोजित दशहरा पर्व के दौरान सामने आई स्थिति ने आयोजन की गुणवत्ता और जिम्मेदारों की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसी व्यवस्था से नगर पालिका को क्या हासिल हुआ? क्या शहर की जनता को केवल कार्यक्रम दिखाना ही जिम्मेदारी है, या फिर आयोजन को गरिमापूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराना भी प्रशासन का कर्तव्य है?
नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती रेखा देवा गढ़वाल, नगर प्रशासन और आयोजन से जुड़े जिम्मेदार लोगों से यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि आखिर दशानन दहन के लिए की गई तैयारियों की समीक्षा किसने की थी? रावण के पुतले की गुणवत्ता और दहन की व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि तैयारी में कोई कमी रह गई थी, तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा?
#ट्रिपल इंजन की सरकार, फिर जवाबदेही किसकी?
जांजगीर-नैला नगर पालिका की कार्यप्रणाली को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। अब दशहरा आयोजन ने एक बार फिर सार्वजनिक व्यवस्थाओं की गंभीरता पर बहस छेड़ दी है। क्या पांच साल के लिए चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधियों को यह मान लेना चाहिए कि जनता के सवालों का जवाब देना जरूरी नहीं? क्या ट्रिपल इंजन की सरकार में नगर पालिका खुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगी है?
सत्ता पक्ष के निर्वाचित पार्षदों की भूमिका पर भी सवाल हैं। क्या वे शहर की व्यवस्थाओं में कमी होने पर जिम्मेदारों से सवाल पूछेंगे, या फिर चुप्पी साधकर सब कुछ सामान्य मान लेंगे? वहीं, विपक्षी पार्षदों की भूमिका भी चर्चा में है। विपक्ष का काम केवल आंदोलन करना और तस्वीरें खिंचवाना नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों पर लगातार निगरानी रखना और जवाबदेही सुनिश्चित कराने के लिए ठोस पहल करना भी है।
#सरकारी खर्च से आयोजन हुआ तो हिसाब भी सार्वजनिक हो
हाईस्कूल मैदान में आयोजित दशहरा पर्व को लेकर एक अहम सवाल आयोजन के खर्च का भी है। क्या इस कार्यक्रम पर नगर पालिका के सरकारी मद से राशि खर्च की गई? यदि हां, तो रावण निर्माण, मैदान की व्यवस्था और अन्य व्यवस्थाओं पर कितनी राशि खर्च हुई? भुगतान किसे किया गया और आयोजन की निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास थी?
स्थानीय पत्रकारों को आमंत्रित नहीं किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि आयोजन सार्वजनिक था और इसमें सरकारी धन खर्च हुआ, तो पत्रकारों को आमंत्रित नहीं करने की वजह क्या थी? क्या नगर पालिका इन सवालों का स्पष्ट जवाब देकर खर्च और आयोजन की जानकारी सार्वजनिक करेगी?
#कलियुग के रावण ने खोल दिए व्यवस्था के पर्दे!
कल हाईस्कूल मैदान में दशानन का दहन तो हुआ, लेकिन उसके साथ ही आयोजन की व्यवस्थाओं पर उठे सवाल भी सामने आ गए। रावण के 10 सिर और एक हाथ का देर तक बचा रहना लोगों को प्रतीकात्मक रूप से यह सोचने पर मजबूर कर गया कि कहीं इस कलियुग के रावण ने ही जिम्मेदारों की व्यवस्थाओं के पर्दे तो नहीं खोल दिए!
जिस रावण को बुराई के अंत का प्रतीक मानकर जलाया जाता है, उसी रावण का दहन यदि अव्यवस्था के कारण चर्चा का विषय बन जाए, तो सवाल पुतले पर नहीं, बल्कि व्यवस्था संभालने वालों की तैयारी और जवाबदेही पर उठेंगे।नगर पालिका अध्यक्ष, नगर प्रशासन और आयोजन से जुड़े जिम्मेदारों को सामने आकर बताना चाहिए कि दशानन दहन की ऐसी स्थिति क्यों बनी। जनता को भाषण या आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब चाहिए। क्योंकि कुर्सी पांच साल के लिए मिल सकती है, लेकिन जनभावनाओं की अनदेखी पर उठने वाले सवालों से हमेशा बचा नहीं जा सकता।रावण तो पांच मिनट में जल गया, लेकिन उसकी अधूरी जलन ने नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर कई सवाल छोड़ दिए। अब देखना यह है कि जिम्मेदार इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर खामोशी की आड़ में मामला टाल दिया जाता है।
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