जांजगीर चांपा

होटल और मांस-मटन दुकानों की गंदगी से भीमा तालाब बेहाल, जनता का फूटा गुस्सा—नगर पालिका अध्यक्ष और पूरे नगर पालिका प्रशासन पर उठे सवाल, 14 अक्टूबर को आंदोलन की चेतावनी!

जांजगीर शहर की पहचान, आस्था और ऐतिहासिक विरासत से जुड़े भीमा तालाब की बदहाली अब गंभीर जनसमस्या बन चुकी है। तालाब परिसर और आसपास के इलाकों में संचालित कई होटल, मांस-मटन की दुकानें और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाली गंदगी, प्लास्टिक, खाद्य अपशिष्ट और गंदा पानी लगातार तालाब में पहुंच रहा है। इसके चलते कभी शहर की शान माना जाने वाला भीमा तालाब अब धीरे-धीरे गंदगी, दुर्गंध और अव्यवस्था का केंद्र बनता जा रहा है।

 

तालाब के चारों ओर कचरे के ढेर, नालियों का गंदा पानी, सड़ते हुए अपशिष्ट और दुर्गंध का माहौल बना हुआ है। स्थिति यह है कि तालाब के आसपास से गुजरना भी लोगों के लिए मुश्किल हो गया है। जहां कभी सुबह-शाम शहरवासी सुकून के पल बिताने, टहलने और परिवार के साथ समय गुजारने पहुंचते थे, वहीं अब बदबू, मच्छरों और गंदगी के कारण लोगों ने यहां आना लगभग बंद कर दिया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि तालाब परिसर में स्वच्छता और सौंदर्यीकरण के नाम पर कई बार घोषणाएं की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

 

स्थानीय लोगों का आरोप है कि होटल और मांस-मटन दुकानों से निकलने वाले अपशिष्ट के निस्तारण की कोई ठोस और वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं है। कई दुकानों और प्रतिष्ठानों का गंदा पानी खुले नालों के जरिए तालाब की ओर बह रहा है। मांस-मटन दुकानों से निकलने वाले अवशेषों को भी कथित तौर पर खुले में फेंक दिया जाता है, जिससे आसपास दुर्गंध फैलती है और संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि जिम्मेदार विभागों को इस समस्या की जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है।

 

तालाब के आसपास रहने वाले नागरिकों के मुताबिक, बारिश के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। नालियों का पानी ओवरफ्लो होकर तालाब में मिल जाता है। कचरा पानी के साथ बहकर तालाब में जमा होता रहता है। इससे तालाब का पानी प्रदूषित हो रहा है और जलीय जीवन पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि समय रहते गंदे पानी और कचरे के प्रवाह को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में तालाब का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।

 

जनता का आरोप है कि नगर पालिका प्रशासन केवल दिखावे की सफाई और कागजी कार्रवाई तक सीमित है। कुछ मौकों पर सफाई अभियान चलाकर फोटो खिंचवाए जाते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद तालाब परिसर में फिर वही कचरा, गंदगी और दुर्गंध दिखाई देने लगती है। नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती चित्रलेखा गढ़वाल और पूरे नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर जनता में नाराजगी बढ़ती जा रही है। नागरिकों का कहना है कि अध्यक्ष, पार्षदों और जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करना चाहिए और केवल औपचारिक निर्देश जारी करने के बजाय स्थायी समाधान लागू करना चाहिए। जनता अब नगर पालिका अध्यक्ष और पूरे नगर पालिका प्रशासन से सीधे सवाल कर रही है कि आखिर तालाब की बदहाली के लिए जवाबदेही किसकी है।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहर की सार्वजनिक संपत्ति और जनसुविधा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण स्थल में गंदा पानी और कचरा पहुंचने से रोकने के लिए अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या नगर पालिका प्रशासन को इस बात का इंतजार है कि तालाब पूरी तरह प्रदूषित हो जाए या कोई गंभीर बीमारी फैलने के बाद कार्रवाई की जाए? क्या होटल और मांस-मटन दुकानों के संचालकों को नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी किसी की नहीं है? यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो संबंधित प्रतिष्ठानों पर जुर्माना, नोटिस और लाइसेंस संबंधी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?

 

गौरतलब है कि विधायक ब्यास कश्यप ने भी भीमा तालाब का निरीक्षण कर नगर पालिका प्रशासन को तत्काल सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश दिए थे। निरीक्षण के बाद लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब तालाब की स्थिति में स्थायी सुधार होगा। आरोप है कि निर्देश के बाद एक दिन औपचारिक सफाई कराई गई, कुछ स्थानों से कचरा हटाया गया और प्रशासनिक सक्रियता दिखाई गई, लेकिन उसके बाद फिर वही गंदगी, बदबू और लापरवाही लौट आई।

 

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि विधायक के निर्देशों के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है, तो यह प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी और अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल है। केवल एक दिन की सफाई से तालाब की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए नियमित सफाई, नालियों की मरम्मत, गंदे पानी के प्रवाह को रोकने, कचरा संग्रहण की व्यवस्था करने और तालाब के आसपास संचालित दुकानों की नियमित जांच की आवश्यकता है।

 

समस्या केवल सफाईकर्मियों की कमी की नहीं, बल्कि होटल, मांस-मटन दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे की निगरानी, निस्तारण और प्रशासनिक जवाबदेही के अभाव की भी है। नागरिकों का कहना है कि नगर पालिका को यह स्पष्ट करना चाहिए कि तालाब के आसपास कितने होटल और मांस-मटन की दुकानें संचालित हैं, उनमें से कितनों के पास वैध अनुमति है और कितने प्रतिष्ठान अपशिष्ट निस्तारण के नियमों का पालन कर रहे हैं।

 

जनता पूछ रही है कि विधायक के निर्देशों का असर सिर्फ एक दिन तक ही क्यों रहता है? नगर पालिका अध्यक्ष, पार्षद और जिम्मेदार अधिकारी तालाब में गंदा पानी और कचरा पहुंचने से रोकने के लिए नियमित निगरानी और कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे? क्या अधिकारियों ने कभी यह जांच की कि तालाब में गंदा पानी किन-किन नालियों और प्रतिष्ठानों से पहुंच रहा है? क्या दोषी दुकानदारों और प्रतिष्ठानों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई? यदि कार्रवाई की गई है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

 

शहर की बदहाल तस्वीर आखिर किसकी जिम्मेदारी है—नगर पालिका अध्यक्ष की, पूरे नगर पालिका प्रशासन की, जिला प्रशासन की या फिर पूरी सरकार की? जब सरकार स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, तो भीमा तालाब जैसे प्रमुख सार्वजनिक स्थल की यह दुर्दशा उन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। शहरवासियों का कहना है कि तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जांजगीर की ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक विरासत है। इसकी रक्षा करना प्रशासन के साथ-साथ पूरे समाज की जिम्मेदारी है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन विभागों की है जिन्हें जनता की सुविधाओं और सार्वजनिक संपत्तियों की देखरेख के लिए नियुक्त किया गया है।

 

लोगों ने मांग की है कि भीमा तालाब के चारों ओर तत्काल विशेष सफाई अभियान चलाया जाए। तालाब में जाने वाले सभी गंदे नालों को चिन्हित कर उनका प्रवाह रोका जाए। होटल और मांस-मटन दुकानों के लिए अलग-अलग अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था अनिवार्य की जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों पर जुर्माना लगाया जाए और जरूरत पड़ने पर उनके लाइसेंस रद्द किए जाएं। इसके अलावा तालाब परिसर में नियमित सफाईकर्मियों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरों की स्थापना, कचरा फेंकने वालों पर कार्रवाई और नागरिकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन शुरू करने की भी मांग की गई है।

 

अब शहरवासी चुप बैठने के मूड में नहीं हैं। 14 अक्टूबर को **‘भीमा तालाब बचाओ अभियान’** के तहत आंदोलन की तैयारी की जा रही है। यह आंदोलन केवल तालाब की सफाई की मांग नहीं, बल्कि होटल और मांस-मटन दुकानों की गंदगी पर रोक लगाने, गंदे पानी के निस्तारण की स्थायी व्यवस्था करने, तालाब के संरक्षण के लिए ठोस योजना बनाने और नगर पालिका अध्यक्ष, पूरे नगर पालिका प्रशासन, प्रशासन तथा सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग भी है।

 

आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि भीमा तालाब को उपेक्षा और लापरवाही का शिकार नहीं बनने दिया जाएगा। यदि जल्द ही स्थायी सफाई, नियमित रखरखाव, गंदगी के स्रोतों पर कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। नागरिकों ने चेतावनी दी है कि वे तालाब की दुर्दशा को लेकर जिला प्रशासन, नगर पालिका और संबंधित विभागों के कार्यालयों तक अपनी आवाज पहुंचाएंगे।

 

शहरवासियों का कहना है कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि शहर की धरोहर और जनता के अधिकारों के लिए है। लोगों ने सभी सामाजिक संगठनों, व्यापारियों, युवाओं, महिलाओं और पर्यावरण प्रेमियों से 14 अक्टूबर के आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। अब देखना होगा कि नगर पालिका अध्यक्ष और पूरा नगर पालिका प्रशासन इस जनआक्रोश को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई करता है या फिर एक बार फिर आश्वासन और औपचारिक सफाई तक ही मामला सीमित रह जाता है।

 

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