जांजगीर चांपा

हाई स्कूल ग्राउंड जांजगीर में ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ का चतुर्थ दिवस, रासेश्वरी देवी ने बताया—परमानंद की चाह ही जीव का स्वभाव, इच्छाओं की दौड़ से बढ़ता है तनाव ।

 

हाई स्कूल ग्राउंड जांजगीर में ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ का चतुर्थ दिवस, रासेश्वरी देवी ने बताया—परमानंद की चाह ही जीव का स्वभाव, इच्छाओं की दौड़ से बढ़ता है तनाव

जांजगीर। हाई स्कूल ग्राउंड जांजगीर में आयोजित ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के चतुर्थ दिवस हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने कठोपनिषद के संवादों और वैदिक सिद्धांतों के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य, असीम आनंद की चाह और मानसिक तनाव के मूल कारणों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रवचन के दौरान रासेश्वरी देवी जी ने कठोपनिषद के प्रसिद्ध मंत्र “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” का उल्लेख करते हुए नचिकेता और यमराज के संवाद को समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक उत्थान और परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिला है। उनके अनुसार पशु-पक्षी और स्वर्ग के देवता भोग योनि में होते हैं, जबकि मनुष्य योनि को कर्म योनि माना गया है, जहां जीव अपने पुरुषार्थ और श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से जीवन की दिशा बदल सकता है।

इच्छाओं और अपेक्षाओं से पैदा होता है तनाव

आधुनिक जीवन की बड़ी समस्या तनाव पर चर्चा करते हुए देवी जी ने कहा कि तनाव कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि मन की एक अवस्था है। जब मनुष्य अपनी बनाई हुई इच्छाओं और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए लगातार दौड़ता है और वे पूरी नहीं होतीं, तो उसके भीतर तनाव उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा कि केवल बाहरी ज्ञान और विज्ञान से मन के इस तनाव का पूर्ण समाधान संभव नहीं है, इसके लिए उपनिषदों में बताए गए अंतरंग ज्ञान और ब्रह्म विद्या को समझना जरूरी है।

हर जीव क्यों चाहता है सुख और शांति?

प्रवचन में उन्होंने यह भी समझाया कि संसार का प्रत्येक प्राणी सुख, शांति और आनंद की तलाश में क्यों रहता है। वेदों और उपनिषदों के संदर्भ में उन्होंने बताया कि जीवात्मा परमात्मा के अंश के रूप में अनंत आनंद की चाह रखती है। इसी कारण मनुष्य सीमित सांसारिक वस्तुओं में असीम आनंद तलाशता है, लेकिन अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर निराशा और दुख का सामना करता है। उन्होंने कहा कि जब तक जीव अपने मूल स्रोत भगवान की शरण में नहीं जाता, तब तक उसकी आनंद की खोज पूरी नहीं होती।

वृद्धावस्था में पछतावे से बचने का संदेश

युवाओं समेत उपस्थित श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि मनुष्य का पूरा जीवन अक्सर नाम, यश, धन और सांसारिक जिम्मेदारियों की दौड़ में निकल जाता है और अंत में वृद्धावस्था में पछतावा रह जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसे केवल सांसारिक भोग-विलास में न गंवाकर भगवान की साधना और आत्मिक उत्थान में लगाना चाहिए।

‘उपनिषद ज्ञानामृत’ प्रवचन श्रृंखला 8 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम 6:30 से रात 8:30 बजे तक हाई स्कूल ग्राउंड, जांजगीर में जारी रहेगी। आयोजकों ने श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं से समय पर पहुंचकर प्रवचन का लाभ लेने की अपील की है।

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