विकास जनता की जरूरत या नेताओं के श्रेय और रुतबे की राजनीति?

विकास जनता की जरूरत या नेताओं के श्रेय और रुतबे की राजनीति?
जांजगीर-चांपा जिले में जनता की जरूरत और मांग के मुताबिक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा सहित कई क्षेत्रों में विकास कार्यों की सौगात मिल रही है। सरकार की योजनाओं से काम स्वीकृत हो रहे हैं, बजट आ रहा है और जनता को सुविधाएं मिलने की उम्मीद बंध रही है। यह लोकतंत्र और विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन चिंता की बात तब शुरू होती है, जब जनता की जरूरत से ज्यादा नेताओं में श्रेय लेने की होड़ दिखाई देने लगे।काम जनता का, पैसा सरकारी और जरूरत जनता की… फिर हर काम पर अपना नाम जोड़ने की इतनी बेचैनी क्यों?किसी विकास कार्य में जिसकी वास्तविक भूमिका रही, उसका योगदान सामने आना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल तब उठता है जब जिनके पास अनुशंसा का अधिकार नहीं, वे भी अनुशंसा का श्रेय लेने लगें। जिनका क्षेत्र नहीं, वे दूसरे क्षेत्रों में भी अपने प्रभाव और रुतबे को बनाए रखने के लिए अनुशंसा और उपलब्धि का दावा करते नजर आएं। पक्ष हो या विपक्ष, सत्ता में हों या बाहर—श्रेय की दौड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता।
क्या अब राजनीति का पैमाना यह रह गया है कि जनता के लिए कितना काम हुआ, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि उसका श्रेय किसके नाम से जाएगा?
बड़े विकास कार्यों के साथ ऐसी चर्चाएं भी सामने आती हैं कि कहीं राजनीतिक श्रेय की इस होड़ के पीछे ठेकेदारों पर दबाव, कमीशन या निजी हितों की कोई भूमिका तो नहीं? यदि ऐसी शिकायतें हैं तो उन्हें महज राजनीतिक आरोप बनाकर छोड़ने के बजाय दस्तावेज, प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच के आधार पर सच सामने आना चाहिए। क्योंकि विकास कार्यों में पारदर्शिता और गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।नेताओं को यह समझना होगा कि अनुशंसा करना जनसेवा है, एहसान नहीं। जनता के वोट से मिली जिम्मेदारी किसी काम पर निजी मालिकाना हक नहीं देती। जनता ने प्रतिनिधि इसलिए चुना है कि उसकी आवाज सरकार तक पहुंचे, उसकी समस्याओं का समाधान हो और क्षेत्र का विकास हो।और जिनका क्षेत्र नहीं है, उनके लिए भी सवाल उतना ही सीधा है—दूसरे क्षेत्र के काम में श्रेय लेने की इतनी बेचैनी आखिर क्यों? क्या राजनीतिक रुतबा इतना कमजोर है कि उसे बनाए रखने के लिए हर विकास कार्य की तस्वीर में अपना नाम जरूरी हो गया है?जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फीता किसने काटा, पोस्टर पर किसका फोटो बड़ा था या सोशल मीडिया पर किसने सबसे पहले उपलब्धि लिखी। जनता यह देखेगी कि सड़क बनी या नहीं, अस्पताल में सुविधा बढ़ी या नहीं, स्कूल में व्यवस्था सुधरी या नहीं और जिस काम के लिए सालों से मांग की जा रही थी, वह जमीन पर उतरा या नहीं।याद रखना चाहिए कि विकास किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है। सरकार जनता के टैक्स से चलती है और विकास का पैसा भी जनता का है। जनप्रतिनिधि उस पैसे को जनता की जरूरत के मुताबिक खर्च कराने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इसके बदले श्रेय की राजनीति करना लोकतंत्र की मूल भावना से बड़ा नहीं हो सकता।आज श्रेय के लिए दावेदार कई हो सकते हैं। कोई अनुशंसा बताएगा, कोई स्वीकृति का हवाला देगा, कोई अपनी सरकार बताएगा और कोई अपना प्रभाव। लेकिन इतिहास और जनता के सामने तस्वीर इतनी आसान नहीं होती। कागज पर किसकी भूमिका थी और जमीन पर जनता को किसका लाभ मिला—दोनों बातें सामने रहेंगी।
इसलिए नेताओं के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस जनता के लिए काम होना चाहिए, उसी जनता के सामने काम से ज्यादा श्रेय की राजनीति दिखाई देने लगे।
जनता को नेता का नाम नहीं, काम चाहिए।
जनता को फोटो नहीं, सुविधा चाहिए।
जनता को श्रेय का दावा नहीं, विकास का परिणाम चाहिए।और सबसे महत्वपूर्ण बात—श्रेय कोई नेता खुद अपने नाम नहीं लिख सकता। श्रेय की अंतिम मुहर जनता लगाती है।आज चाहे जितने दावे कर लिए जाएं, कल जनता जरूर पूछेगी—काम में आपका वास्तविक योगदान कितना था और श्रेय में आपका हिस्सा कितना?
यही लोकतंत्र का आईना है। इसमें चेहरा वही दिखाई देता है, जो वास्तव में जनता के बीच काम करता है। बाकी श्रेय की होड़, रुतबे की बेचैनी और उपलब्धियों के दावों का फैसला भी आखिर जनता ही करेगी।
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