पोर्टल खुलते ही शिकायतकर्ता कार्यकर्ताओं पर भी उठे सवाल, आखिर शिकायत के पीछे क्या था मकसद?
24 घंटे बाद चुनावी पोर्टल फिर ओपन, दोनों प्रत्याशियों को मिला चुनाव लड़ने का रास्ता; अब शिकायत करने वालों की भूमिका भी जांच के घेरे में।

पोर्टल खुलते ही शिकायतकर्ता कार्यकर्ताओं पर भी उठे सवाल, आखिर शिकायत के पीछे क्या था मकसद?
24 घंटे बाद चुनावी पोर्टल फिर ओपन, दोनों प्रत्याशियों को मिला चुनाव लड़ने का रास्ता अब शिकायत करने वालों की भूमिका भी जांच के घेरे में
जांजगीर-चांपा यूथ कांग्रेस जिला अध्यक्ष चुनाव में 24 घंटे बाद चुनावी पोर्टल दोबारा खुलते ही पूरा मामला एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया है। जिन आरोपों को लेकर चुनावी माहौल गरमाया, शिकायतें हुईं और दोनों प्रत्याशियों बलबीर भाटिया और अंकित सिसोदिया के नाम पोर्टल से हटाए गए, अब उसी घटनाक्रम में शिकायतकर्ता कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर शिकायत संगठन में चुनावी गड़बड़ी रोकने के लिए की गई थी या फिर चुनावी मुकाबले में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को दबाव में लाने या दौड़ से बाहर करने की रणनीति थी?
बाहरी लोगों और कथित पेड वर्करों के जरिए वोट कराने के आरोपों के बीच दोनों प्रत्याशियों के नाम पोर्टल से हटाए गए थे। लेकिन करीब 24 घंटे बाद पोर्टल फिर से खोल दिया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि आरोप इतने गंभीर थे तो पार्टी फोरम की जांच में क्या सामने आया? क्या दोनों प्रत्याशियों को फिलहाल क्लीन चिट मिल गई है, या फिर जांच अभी भी जारी है और आगे कार्रवाई की गुंजाइश बनी हुई है?
पोर्टल दोबारा खुलने के बाद अब दोनों प्रत्याशी फिर से वोट जुटाने की कवायद में उतरेंगे। यानी चुनावी मुकाबला एक बार फिर मैदान में लौट आया है। ऐसे में जिस शिकायत के बाद दोनों प्रत्याशियों पर सवाल खड़े हुए थे, उसकी मंशा और शिकायतकर्ताओं की भूमिका भी अब संगठन के लिए अहम सवाल बन सकती है।
क्या शिकायत वास्तव में चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए थी? क्या शिकायत में लगाए गए आरोपों के पीछे ठोस सबूत थे? या फिर चुनावी मुकाबले में दबाव बनाने के लिए शिकायत को हथियार बनाया गया? पोर्टल खुलने के बाद अब इन सवालों का जवाब भी संगठन के सामने रखना जरूरी हो गया है।











