पंचायत भवन में सरपंच पति का शराब पीते वीडियो वॉयरल,महिला जनप्रतिनिधियों के ‘प्रतिनिधि राज’ पर सवाल।
जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत कोटिया में पंचायत भवन के अंदर शराब पीते एक व्यक्ति का कथित वीडियो सामने आने के बाद पंचायत व्यवस्था और महिला जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। वायरल वीडियो में एक व्यक्ति शासकीय कामकाज के लिए इस्तेमाल होने वाली टेबल पर पैर रखकर शराब पीता नजर आ रहा है। वीडियो में दिखाई दे रहे व्यक्ति को सरपंच पति बताया जा रहा है। मामले को लेकर ग्रामीणों ने जनपद पंचायत सीईओ और जिला कलेक्टर से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है,,मामला सिर्फ पंचायत भवन में कथित शराबखोरी तक सीमित नहीं है। पंचायतों में महिला जनप्रतिनिधियों के बजाय उनके प्रतिनिधियों के सक्रिय होने के आरोप लंबे समय से सामने आते रहे हैं। कहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर कथित वसूली से जुड़े ऑडियो सामने आते हैं, तो कहीं अधिकारी-कर्मचारियों को धमकाने-चमकाने, विवाद और मारपीट के आरोप लगते हैं। पंच, सरपंच, जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे पदों पर महिला जनप्रतिनिधियों के निर्वाचित होने के बावजूद उनके प्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका कई बार सवालों के घेरे में रही है,,महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी में आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व और निर्णय लेने का अधिकार देना है, लेकिन जब निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह उनके पति या अन्य प्रतिनिधि पंचायत के कामकाज में दखल देते नजर आते हैं तो महिला सशक्तिकरण की मूल भावना पर सवाल उठना स्वाभाविक है,,कोटिया का वायरल वीडियो इसी बहस को फिर सामने ले आया है। पंचायत भवन जैसी शासकीय जगह पर कथित शराबखोरी और उसके बाद ग्रामीणों की शिकायत ने प्रशासन के सामने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत इस बात की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाए,,साथ ही सरकार को पंचायतों में महिला जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने पर भी विचार करना चाहिए। नगरीय निकायों की तर्ज पर पंचायतों में भी निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज में अनधिकृत दखल पर रोक लगाने की व्यवस्था लागू होने से वे अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल कर सकेंगी,महिला सशक्तिकरण सिर्फ आरक्षण देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सशक्तिकरण तब होगा, जब महिला जनप्रतिनिधि खुद निर्णय लें, अधिकारी-कर्मचारियों से सीधे संवाद करें और पंचायत की जिम्मेदारी अपने अधिकारों के साथ स्वतंत्र रूप से निभाएं। कोटिया का मामला अब इसी बड़े सवाल को सामने ला रहा है कि पंचायतों में ‘प्रतिनिधि राज’ खत्म कर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार कब मिलेंगे,,












