हमने तो सुना था तरक्की के बाद पता बदलता है लेकिन यहां मरने की बाद ठिकाना बदलता है पहले भूख से मरे,अब ट्रेलर से कुचले गए — गायों की किस्मत नहीं बदली, बस मौत का पता बदल गया” जिला प्रशाशन का त्वरित कार्यवाही दिखा धरातल पर मवेशी मालिकों पर अब होगी fir।

कभी कहा जाता था कि छत्तीसगढ़ की पहचान ‘गाय, गांव और किसान’ से है। मवेशियों का संरक्षण, उनके चारे-पानी की व्यवस्था और सुरक्षित जीवन, हर राजनीतिक दल की जुबान पर था। लेकिन बीते कुछ सालों में गायों की किस्मत बदली नहीं, बस उनका मरने का पता और तरीका बदल गया है।
वो दौर… जब गौठान चर्चा में थे
जब कांग्रेस की सरकार थी, तब बीजेपी विपक्ष में बैठकर गौठानों की हालत पर लगातार सवाल उठाती रही। दूर-दराज़ के इलाकों में जाकर दूरबीन से गौठानों का निरीक्षण करना, गायों की हड्डियां गिनना और चारे की थैलियों का हिसाब मांगना, उस दौर की राजनीतिक दिनचर्या थी। तब तस्वीरें वायरल होती थीं—एक बाड़े में कमजोर, भूख से लड़खड़ाती गायें, बासी पानी से भरे टांके, और बगल में खड़े नेता, कैमरों के सामने गुस्से में भरी बातें करते हुए।
आज… सड़क पर बिखरा दर्द
लेकिन अब जब बीजेपी सत्ता में है, तस्वीर बदल गई है। गौठानों की जगह अब सड़कें चर्चा में हैं। मवेशी आज भी मर रहे हैं, पर कारण भूख नहीं, बल्कि तेज रफ्तार ट्रेलरों के पहिए हैं। हाल ही में जांजगीर-चांपा के अमरताल गांव के पास एक ट्रेलर ने 19 गायों को रौंद दिया। लाशें सड़क पर बिखरी रहीं, खून और मिट्टी में लथपथ। लेकिन इस घटना के 18 घंटे बाद भी किसी जनप्रतिनिधि ने न तो वहां पहुंचने की जहमत उठाई, न ही सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त करने की औपचारिकता निभाई।
सत्ताधारी पार्टी विटामिन-ई वाली आंखें
विपक्ष में रहते हुए दूरबीन लेकर गाय खोजने वाले नेता अब मानो ‘विटामिन-ई’ खाकर ऐसे आंखों वाले हो गए हैं, जिन्हें हादसे दिखाई ही नहीं देते। सवाल उठता है—क्या सत्ता में आने के बाद संवेदनाएं भी बदल जाती हैं?
कांग्रेस की चुप्पी भी कटघरे में
कांग्रेस भी अपने पुराने रवैये से उबर नहीं पाई। आज भी वो गौठान बंद करने के मुद्दे पर सड़क जाम करने को तैयार है, लेकिन 19 गायों की सड़क पर दर्दनाक मौत पर खामोश है। क्या मवेशियों के लिए संवेदना केवल तब होती है जब मामला राजनीतिक फायदे का हो?
गाय की मौत – राजनीति का चेहरा
चाहे गौठान में भूख से दम तोड़ना हो या सड़क पर कुचल जाना—गायों की तकदीर में बस दर्द ही लिखा दिखता है। फर्क बस इतना है कि पहले मौत बाड़े में होती थी, अब खुले आसमान के नीचे, वाहनों के पहियों तले।यह कहानी सिर्फ गायों की नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक और सामाजिक चरित्र की भी है, जो सत्ता और विपक्ष की अदला-बदली में इंसानियत की बारीक परतें खोता जा रहा है।
सड़क पर अब भी जानवरों का कब्जा, प्रशासनिक सख्ती भी बेअसर
कलेक्टर के सख्त निर्देश और पुलिस कप्तान द्वारा सड़क पर घूम रहे निराश्रित मवेशियों को रेडियम पट्टी लगाने के बाद भी हालात में सुधार नहीं आया है। मुख्य मार्गों और गलियों में अब भी मवेशियों का झुंड खुलेआम घूम रहा है।रेडियम पट्टी लगाने का मकसद था कि रात के समय वाहन चालकों को मवेशी आसानी से दिख जाएं और हादसों में कमी आए, लेकिन आंकड़े और घटनाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। हालिया दिनों में कई सड़क हादसों में इन बेसहारा जानवरों की जान जा चुकी है, वहीं कई वाहन चालक भी घायल हुए हैं।स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब कलेक्टर के आदेश और पुलिस की पहल का असर नहीं दिख रहा, तो आखिर जिम्मेदारी तय कब होगी और इन मवेशियों को सुरक्षित स्थान कब मिलेगा।
तात्कालिक कार्यवाही करते जिला कलेक्टर जन्मेजय महोबे और SP विजय पाण्डेय ने स्वयं मोर्चा संभालते हुए कड़े निर्देशन पर इस घटना में गाड़ी मालिक के ऊपर fir कर गाड़ी को हिरासत में लिया गया है और आवश्यक कार्यवाही हेतु जांच टिम बनाया गया है सड़क किनारे रेडियम और रात्रि में धीमी रफ्तार गाड़ी चलाने जगह जगह सूचना बोर्ड भी लगाया जा है अमरताल को पहले से एक्सीडेंट स्पॉट घोषित किया गया है वही पूरे जिले भर मवेशी दुर्घटना का शिकार न हो ऐसी बंदोबस्त युद्ध स्तर पर जारी है और रात्रि में ट्रैफिक जवान सहित ग्राम पंचायत और नगरीय क्षेत्र के कर्मचारी को निर्देशित किया गया है ।
आपके इस मसौदे को मैं थोड़ा परिष्कृत करके एक धारदार और साफ़-सुथरी खबर/लेख के रूप में तैयार कर देता हूँ, ताकि यह पोर्टल या अख़बार में छपने लायक बन जाए।
आवारा मवेशी छोड़ने वालों पर होगी FIR, प्रशासन सख़्त
जिले में सड़कों पर आवारा मवेशियों की समस्या को लेकर प्रशासन ने अब कड़ा रुख अपनाया है। जिला प्रशासन और पुलिस ने साफ़ निर्देश दिए हैं कि जिन लोगों द्वारा अपने मवेशियों को सड़क पर छोड़ दिया जाता है, उनके खिलाफ FIR दर्ज की जाएगी। यह कदम पूरी तरह उचित माना जा रहा है, क्योंकि जब दूध देते समय मवेशियों के मालिक की पहचान संभव है, तो आवारा छोड़ते समय भी मालिक की पहचान होनी चाहिए।
प्रशासन की ओर से इस दिशा में काफी हद तक कार्रवाई शुरू कर दी गई है, लेकिन अब ज़िम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं रह जाती। सामाजिक संगठनों, किसानों और आम नागरिकों को भी आगे आना होगा, ताकि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके। आखिरकार, यह हमारी भी सामूहिक ज़िम्मेदारी है कि सड़कें सुरक्षित रहें और बेजुबान मवेशियों का जीवन भी संकट में न पड़े।













