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भाजपा नेता पर FIR शून्य, शिकायत दर्ज करने वाले ASI लाइन अटैच, कांग्रेस बोली- सत्ता के दबाव में पुलिस।

भाजपा नेता पर FIR शून्य, शिकायत दर्ज करने वाले ASI लाइन अटैच, कांग्रेस बोली- सत्ता के दबाव में पुलिस

जांजगीर-चांपा जिले में भाजपा नेता अमर सुल्तानिया से जुड़ा मामला अब सियासी तूफान बनता जा रहा है। ग्रामीणों ने अमर सुल्तानिया पर अवैध उत्खनन करने, विरोध करने पर धमकी देने और दबाव बनाने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई थी। लेकिन मामला दर्ज होने के कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने ताबड़तोड़ जांच कर FIR को ही शून्य घोषित कर दिया।मामले ने तब और गंभीर मोड़ ले लिया जब FIR दर्ज करने वाले चौकी नैला में पदस्थ सहायक उप निरीक्षक सजनी कृष्ण कुमार कोसले को तत्काल लाइन अटैच कर दिया गया। पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी आदेश में बिना वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराए मामला दर्ज करने को अनुशासनहीनता और स्वेच्छाचारिता बताया गया है।

वहीं कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर सीधा हमला करार दिया है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के दबाव में पुलिस प्रशासन काम कर रहा है और भाजपा नेता को बचाने के लिए पूरे मामले को दबा दिया गया। कांग्रेस का कहना है कि यदि शिकायत गलत थी तो निष्पक्ष और विस्तृत जांच होनी चाहिए थी, लेकिन यहां उल्टा शिकायत दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी पर ही कार्रवाई कर दी गई।

कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो पार्टी ग्रामीणों के साथ सड़क से लेकर आंदोलन तक की लड़ाई लड़ेगी। मामले को लेकर जिले का राजनीतिक माहौल गरमा गया है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

 

विशेषज्ञों की राय :

खनिज और पंचायत मामलों के जानकारों की मानें तो किसी भी प्रकार के उत्खनन कार्य के लिए केवल सरपंच के लेटर पैड पर लिखी अनुमति पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए ग्राम सभा या ग्राम पंचायत की बैठक में विधिवत प्रस्ताव पारित होना जरूरी माना जाता है। साथ ही खनिज विभाग में रॉयल्टी राशि जमा करना और अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करना अनिवार्य होता है, जिससे पंचायत को राजस्व भी प्राप्त होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन नियमों और प्रक्रियाओं की पूरी जांच नहीं की गई तो उत्खनन को वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे में बिना पंचायत अधिनियम और खनिज नियमों की गहन पड़ताल किए FIR को शून्य करने की कार्रवाई अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। जानकारों के अनुसार मामले में निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई बेहद जरूरी है, ताकि ग्रामीणों के आरोपों और प्रशासनिक निर्णय दोनों की सच्चाई सामने आ सके।

 

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